Tuesday, December 10, 2019

जीवन सबको अवसर देता है।

जीवन में अनेक लोग अवसर की तलाश में ही लगे रह जाते हैं।यदि हमें अपने जीवन को सही अर्थ देना है और सही कर्म करना है तो हमें अपने हूनर को पहचानना पड़ेगा।हमें अपनी शिक्षा दीक्षा को जानना होगा कि हम कौन सा कर्म अच्छी तरह से कर सकते हैं।
    दुनिया में सबसे बड़ी समस्या आती है लोगों को अपने कर्म की पहचान नहीं हो पाती है।वह अपनी ऊर्जा को नहीं पहचान पाता है।इससे ही सारी समस्या रहती है।
मनुष्य जब नहीं समझ पाता है कि उसे कौन सा कर्म करना चाहिए तो वह जैसे तैसे कुछ भी करने लगता है।लेकिन इस कार्य में वह अपनी ऊर्जा का सही आकलन नहीं कर पाता है।आनंद के साथ कर्म नहीं कर पाता है तो वह दुःखी रहता है।इस स्थिति में वह अपने लक्ष्य को नहीं पहचान पाता है और उस काम को उसे बीच में ही छोड़ना पड़ता है।
काम के सही नहीं चलने से निराशा जीवन में घेरने लगता है।निराशा के आने से वह अपने सही काम को फिर से नहीं कर पाता है।निराश व्यक्ति जीवन में आगे नहीं बढ़ पाता है।
   एक कहानी मुझे याद आती है।एक शिष्य अपने गुरू के साथ कहीं जा रहा था।गुरू अपने शिष्य के बताये रास्तों का ही अनुसरण कर रहे थे।एक रास्ते पर तिराहे पर जाकर शिष्य ठिठक जाता है।शिष्य से गुरू पूछते हैं कि क्या हुआ ठिठक क्यों गये?शिष्य ने कहा गुरूजी ये तीनों सड़क मुझे भ्रमित कर रही है।तिराहे पर पेड़ भी एक ही समान है।गुरू ने कहा हमेसा यह ध्यान रखो कि किस रास्ते पर तुम्हें जाना है?चलो यहां हमें याद है कि जिस रास्ते पर आक का पौधा बहुत ज्यादा है उसी रास्ते पर जाना है।फिर आगे जो चौराहा है उसका ध्यान है या नहीं वहां का मुझे ध्यान नहीं है।दोनों आगे चलते जा रहे थे।जब चौराहा आया तो शिष्य फिर ठिठक गया।गुरू ने इसबार मार्गदर्शन नहीं किया।वह एक गलत रास्ते पर आगे बढ़ गया।बहुत दूर चलते चलते शिष्य जब थक गया तो पूछा गुरूजी कहीं गलत रास्ते पर तो नहीं आ गये।गुरूजी ने फिर कुछ नहीं कहा।फिर आगे चलते गये और पहुंच गये गंगा किनारे।शिष्य ने कहा गुरूजी हमलोग गलत रास्ते पर आ गये हैं।गुरू ने कहा अब यहीं स्नान ध्यान तपस्या की जायेगी।
     गुरूजी को तो अभ्यास था उपवास का वह तपस्या में लीन हो गये।शिष्य को जब भूख लगी तो गुरूजी से वहां से प्रस्थान करने के लिए कहा।गुरूजी ने दण्डस्वरूप उसे और दो दिनों तक वहीं रहने के लिए कहा।
   शिष्य की हालत भूखे प्यासे खराब होने लगी तो गुरूजी ने शिष्य से कहा"जब कहीं जाते हैं तो उस रास्ते को अच्छी तरह पहचानना चाहिए क्योंकि लौटना भी उसी रास्ते से है।दूसरा जहां जाना हो उसकी मंजिल कहां तक ले जायेगी यह पता होना चाहिए अन्यथा भूखे प्यासे रह जाओगे।"फिर गुरूजी शिष्य को लेकर सही रास्ते पर गये फिर भोजन पानी प्राप्त हुआ।
   यह जीवन और कर्म भी इसी समान है।यदि जीवन सही रास्ते पर चलता है तो मंजिल भी मिल ही जाती है।
   भगवान सभी को जीवन में सैकड़ों अवसर देते हैं।उस अवसर को पहचानना पड़ता है।वह अवसर कौन होगा कहां से आयेगा पता नहीं।हो सकता है आप ट्रेन से जा रहे हैं और किसी व्यक्ति से बात करते हैं और वह किसी काम के बारे में बताता है।वह भी अवसर ही होता है।कभी आप बैंक जाते हैं और कोई बैंकर आपको लॉन का ऑफर कर दे आपको पूंजी की आवश्यकता है।आपको वहीं पर सोचना है कि कितना लॉन लें कि आपका सारा काम हो जायेगा।
   अवसर पहचानने में भूल नहीं करनी चाहिए।

Monday, December 9, 2019

जीवन जीने की ललक

दुनिया में कौन ऐसा है जो अपना जीवन नहींं जीना चाहेगा? यदि आप किसी की जिजीविषा को समझना चाहते हैं तो एक वृद्ध से मिलें जो मृत्यु की शय्या पर लेटा है उसे पता है कि वह ज्यादा दिन तक दुनिया में जीवित नहीं रहनेवाला है।लेकिन वह मरना नहीं चाहता है।वह और थोड़ा और थोड़ा जी लेना चाहता है।
   एक कहानी मुझे याद आती है।एक साधू थे वह भगवान से वरदान पाये थे कि तुम्हें अंतिम के दस वर्ष दिये जाते हैं जिसमें तुम जितना चाहो ऐश मौज से अपना जीवन जी सकते हो।लेकिन मृत्यु से छह माह पूर्व मैं आऊंगा तुम्हें सचेत कर जाऊंगा तुम अपना सभी काम निपटा लेना। मृत्यु से एक दिन पूर्व आऊंगा और तुम्हें एक चेतावनी दे जाऊंगा और तुम्हें खुशी खुशी उस आसन पर बैठना है जिसपर बैठकर तुम्हें स्वर्ग की ओर प्रस्थान करना है।लेकिन यदि तुम उस आसन पर बैठा नहीं मिलेगा और खुशी खुशी जाने को तैयार नहीं मिलेगा तो मैं लौट जाउंगा।उस साधू ने सभी बातों में हां में हां मिला दी।
   वह साधू बड़े ही सुखपूर्वक अपना जीवन जीने लगा।परिवार बन गया ।बेटे बेटियां सब आ गई।दस वर्ष कैसे बीता पता ही नहीं चला।तय समय पर भगवान आये चेतावनी देकर चले गये।छह माह का समय बीत गया।मृत्यु से एक दिन पूर्व भगवान फिर आये ।साधू से कहा हम इस समय आयेंगे तुम उस आसन पर बैठा मिलना।अब साधू सोच में पड़ गया।अभी तो बच्चों की पढ़ाई नहीं हुई है।बेटी की शादी हो जाती तो अच्छा होता।अभी तो हमने जीवन का आनंद भी नहीं लिया है।
   तय समय में भगवान आये लेकिन आसन खाली देखा।फिर सूक्ष्म रूप में भगवन ने साधू को एक विस्तर पर लेटा देखा वह भी चिन्तित ।भगवान वायदे के अनुसार लौट गये ।फिर एक वर्ष तक लौटकर नहीं आये।साधू एक वर्ष तक मृत्यु के भय से विस्तर पर ही लेटा रहा।फिर एक वर्ष बीत गया।फिर वही हालत।इसप्रकार दस वर्ष और बीत गये।
  दसवें साल तक साधू की हालत दयनीय हो गई थी।भगवान ने कहा कि क्यों और कितने शरीर को त्रस्त करोगे?तुम जब मोह माया सबका त्याग कर चुके थे तभी ही तुम अच्छे थे।हमने शायद इस माया के जंजाल में फंसाकर तुममें संसार के प्रति मोह जागृत कर दिया है।यदि तुम आज हमारे साथ नहीं चलते हो तो मैं फिर यहां नहीं आऊंगा और  तुम्हें ले जाने के लिए यम ही आएंगे। आज तुम्हारा अंतिम दिन है।
   साधू ने सोचा कि भगवान सही कह रहे हैं मैं डरकर जी रहा हूं।मृत्यु मेरे करीब है लेकिन मैं जा नहीं रहा हूं।यह जीना तो कोई जीना नहीं है।शरीर में थोड़ी सी भी ताकत नहीं बची है।अब चलने में ही लाभ है।अंतिम समय में रोते बिलखते वह जाने लगे।घर के सभी लोग उनकी वीमारी से परेशान होकर मृत्यु की ही कामना करने लगे थे।
   यही है जीवन का आलाप। जिसका मोह किसी का साथ नहीं छोड़ता है।वह बड़ा से बड़ा ज्ञानी ही क्यों न हो।लेकिन मोह से बंधकर हम जीवन में जितना भी कुछ भी कर लें।लेकिन जब जीवन से जाने का समय आता है तो सबको जाना ही होता है।