एक कहानी मुझे याद आती है।एक साधू थे वह भगवान से वरदान पाये थे कि तुम्हें अंतिम के दस वर्ष दिये जाते हैं जिसमें तुम जितना चाहो ऐश मौज से अपना जीवन जी सकते हो।लेकिन मृत्यु से छह माह पूर्व मैं आऊंगा तुम्हें सचेत कर जाऊंगा तुम अपना सभी काम निपटा लेना। मृत्यु से एक दिन पूर्व आऊंगा और तुम्हें एक चेतावनी दे जाऊंगा और तुम्हें खुशी खुशी उस आसन पर बैठना है जिसपर बैठकर तुम्हें स्वर्ग की ओर प्रस्थान करना है।लेकिन यदि तुम उस आसन पर बैठा नहीं मिलेगा और खुशी खुशी जाने को तैयार नहीं मिलेगा तो मैं लौट जाउंगा।उस साधू ने सभी बातों में हां में हां मिला दी।
वह साधू बड़े ही सुखपूर्वक अपना जीवन जीने लगा।परिवार बन गया ।बेटे बेटियां सब आ गई।दस वर्ष कैसे बीता पता ही नहीं चला।तय समय पर भगवान आये चेतावनी देकर चले गये।छह माह का समय बीत गया।मृत्यु से एक दिन पूर्व भगवान फिर आये ।साधू से कहा हम इस समय आयेंगे तुम उस आसन पर बैठा मिलना।अब साधू सोच में पड़ गया।अभी तो बच्चों की पढ़ाई नहीं हुई है।बेटी की शादी हो जाती तो अच्छा होता।अभी तो हमने जीवन का आनंद भी नहीं लिया है।
तय समय में भगवान आये लेकिन आसन खाली देखा।फिर सूक्ष्म रूप में भगवन ने साधू को एक विस्तर पर लेटा देखा वह भी चिन्तित ।भगवान वायदे के अनुसार लौट गये ।फिर एक वर्ष तक लौटकर नहीं आये।साधू एक वर्ष तक मृत्यु के भय से विस्तर पर ही लेटा रहा।फिर एक वर्ष बीत गया।फिर वही हालत।इसप्रकार दस वर्ष और बीत गये।
दसवें साल तक साधू की हालत दयनीय हो गई थी।भगवान ने कहा कि क्यों और कितने शरीर को त्रस्त करोगे?तुम जब मोह माया सबका त्याग कर चुके थे तभी ही तुम अच्छे थे।हमने शायद इस माया के जंजाल में फंसाकर तुममें संसार के प्रति मोह जागृत कर दिया है।यदि तुम आज हमारे साथ नहीं चलते हो तो मैं फिर यहां नहीं आऊंगा और तुम्हें ले जाने के लिए यम ही आएंगे। आज तुम्हारा अंतिम दिन है।
साधू ने सोचा कि भगवान सही कह रहे हैं मैं डरकर जी रहा हूं।मृत्यु मेरे करीब है लेकिन मैं जा नहीं रहा हूं।यह जीना तो कोई जीना नहीं है।शरीर में थोड़ी सी भी ताकत नहीं बची है।अब चलने में ही लाभ है।अंतिम समय में रोते बिलखते वह जाने लगे।घर के सभी लोग उनकी वीमारी से परेशान होकर मृत्यु की ही कामना करने लगे थे।


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