ऊषा की पहली किरण जब हमारे ऊपर पड़ती है हमारा कण कण खिल खिला उठता है।भोर हो जाने का आभास होता है।प्रकृति का नियम कितना कड़ा है एक मिनट का विलम्ब सूर्य देव को पसन्द नहीं है।हो भी क्यों नहीं ।वह जब स्वयं विलम्ब नहीं करते हैं तो दूसरे से भी तो यही अपेक्षा रखेंगे।
सूर्यदेव का सबसे बड़ा अनुकरण करती हैं नदियां।नदियां सूर्य की लालिमा से सराबोर वह हिलोरें भरने लगती हैं।कल कल करती धारायें अपनी गति से आगे बढ़ने लगती हैं।इतराती मुस्काती वह आगे बढ़ने लगती हैं।समुद्र उसकी मंजिल होती हैं।जैसे वह किसी कवि की कल्पना हो।समुद्र जैसे नदी को बुला रहा हो-
आओ पिय तुम मिल जाओ
बांहो में मेरे तुम भर जाओ
गलबहियां खाती तुम मुस्काओ
पिया पिय का मिलन करवा जाओ'
नदियों की धाराएं समुद्र से मिलने के लिए बढ़ जाती है।समुद्र अपनी दोनों बांहों में भर लेना चाहता है।समुद्र भी हर्षित है प्रफुल्लित है।नदियां मटरा मटरा कर चलती हैं लेकिन समुद्र उतावला हो रहा है नदी को अपनी बाहों में भर लेने के लिए।लेकिन नदियां इतराती बलखाती बढ़ती हैं।उसे कोई जल्दी बाजी नहीं है।
चिड़ियों का दल नदी के किनारे जलपान करने आती हैं।वह जैसे नदी की सारी कारगुजारियों को समझ रहा हो।चिड़ियों का जागना भी समय से हो जाता है।चिड़ियों का भी दो स्थल नित्य का जाना रहता है।एक नदी किनारे तक दूसरा आकाश की ऊंचाई तक।नदी में जल पीने के पश्चात वह आकाश में अठ खेलियां खेलने लगते हैं।प्रात:काल में जैसे आकाश में वह अपना व्यायाम कर रहा हो।आकाश इन जीवों को कहता है-
आओ हे नरजीव चराचर
गाओ हे गीत धराधर
हर्षित हो तुम जीव धरती पर
देखो हुआ अब भोर पूर्व धरापर
यह कवि कल्पना कर सकता है।लेकिन कुछ जीव हैं जिसका आलस्य उसका साथ नहीं छोड़ता है।वह विस्तर छोड़ना ही नहीं चाहता है।
हम प्रकृति के जितने करीब होते हैं उतने ही स्वस्थ होते हैं-
उठ जाग जाग अब भाग भाग
अलस न करे ताग ताग
लग जाये न कहीं दाग दाग
छोड़ो भगाओ रोगराग।
यही जीवन है जब सूर्य हम सबों को जगाने आता है।
Thursday, November 7, 2019
ऊषा कीलप्रथम किरण
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