Jeevandarshan
Wednesday, January 29, 2020
रोजगार की तलाश।
Tuesday, December 24, 2019
Tuesday, December 10, 2019
जीवन सबको अवसर देता है।
जीवन में अनेक लोग अवसर की तलाश में ही लगे रह जाते हैं।यदि हमें अपने जीवन को सही अर्थ देना है और सही कर्म करना है तो हमें अपने हूनर को पहचानना पड़ेगा।हमें अपनी शिक्षा दीक्षा को जानना होगा कि हम कौन सा कर्म अच्छी तरह से कर सकते हैं।
दुनिया में सबसे बड़ी समस्या आती है लोगों को अपने कर्म की पहचान नहीं हो पाती है।वह अपनी ऊर्जा को नहीं पहचान पाता है।इससे ही सारी समस्या रहती है।
मनुष्य जब नहीं समझ पाता है कि उसे कौन सा कर्म करना चाहिए तो वह जैसे तैसे कुछ भी करने लगता है।लेकिन इस कार्य में वह अपनी ऊर्जा का सही आकलन नहीं कर पाता है।आनंद के साथ कर्म नहीं कर पाता है तो वह दुःखी रहता है।इस स्थिति में वह अपने लक्ष्य को नहीं पहचान पाता है और उस काम को उसे बीच में ही छोड़ना पड़ता है।
काम के सही नहीं चलने से निराशा जीवन में घेरने लगता है।निराशा के आने से वह अपने सही काम को फिर से नहीं कर पाता है।निराश व्यक्ति जीवन में आगे नहीं बढ़ पाता है।
एक कहानी मुझे याद आती है।एक शिष्य अपने गुरू के साथ कहीं जा रहा था।गुरू अपने शिष्य के बताये रास्तों का ही अनुसरण कर रहे थे।एक रास्ते पर तिराहे पर जाकर शिष्य ठिठक जाता है।शिष्य से गुरू पूछते हैं कि क्या हुआ ठिठक क्यों गये?शिष्य ने कहा गुरूजी ये तीनों सड़क मुझे भ्रमित कर रही है।तिराहे पर पेड़ भी एक ही समान है।गुरू ने कहा हमेसा यह ध्यान रखो कि किस रास्ते पर तुम्हें जाना है?चलो यहां हमें याद है कि जिस रास्ते पर आक का पौधा बहुत ज्यादा है उसी रास्ते पर जाना है।फिर आगे जो चौराहा है उसका ध्यान है या नहीं वहां का मुझे ध्यान नहीं है।दोनों आगे चलते जा रहे थे।जब चौराहा आया तो शिष्य फिर ठिठक गया।गुरू ने इसबार मार्गदर्शन नहीं किया।वह एक गलत रास्ते पर आगे बढ़ गया।बहुत दूर चलते चलते शिष्य जब थक गया तो पूछा गुरूजी कहीं गलत रास्ते पर तो नहीं आ गये।गुरूजी ने फिर कुछ नहीं कहा।फिर आगे चलते गये और पहुंच गये गंगा किनारे।शिष्य ने कहा गुरूजी हमलोग गलत रास्ते पर आ गये हैं।गुरू ने कहा अब यहीं स्नान ध्यान तपस्या की जायेगी।
गुरूजी को तो अभ्यास था उपवास का वह तपस्या में लीन हो गये।शिष्य को जब भूख लगी तो गुरूजी से वहां से प्रस्थान करने के लिए कहा।गुरूजी ने दण्डस्वरूप उसे और दो दिनों तक वहीं रहने के लिए कहा।
शिष्य की हालत भूखे प्यासे खराब होने लगी तो गुरूजी ने शिष्य से कहा"जब कहीं जाते हैं तो उस रास्ते को अच्छी तरह पहचानना चाहिए क्योंकि लौटना भी उसी रास्ते से है।दूसरा जहां जाना हो उसकी मंजिल कहां तक ले जायेगी यह पता होना चाहिए अन्यथा भूखे प्यासे रह जाओगे।"फिर गुरूजी शिष्य को लेकर सही रास्ते पर गये फिर भोजन पानी प्राप्त हुआ।
यह जीवन और कर्म भी इसी समान है।यदि जीवन सही रास्ते पर चलता है तो मंजिल भी मिल ही जाती है।
भगवान सभी को जीवन में सैकड़ों अवसर देते हैं।उस अवसर को पहचानना पड़ता है।वह अवसर कौन होगा कहां से आयेगा पता नहीं।हो सकता है आप ट्रेन से जा रहे हैं और किसी व्यक्ति से बात करते हैं और वह किसी काम के बारे में बताता है।वह भी अवसर ही होता है।कभी आप बैंक जाते हैं और कोई बैंकर आपको लॉन का ऑफर कर दे आपको पूंजी की आवश्यकता है।आपको वहीं पर सोचना है कि कितना लॉन लें कि आपका सारा काम हो जायेगा।
अवसर पहचानने में भूल नहीं करनी चाहिए।
Monday, December 9, 2019
जीवन जीने की ललक
Thursday, November 7, 2019
ऊषा कीलप्रथम किरण
ऊषा की पहली किरण जब हमारे ऊपर पड़ती है हमारा कण कण खिल खिला उठता है।भोर हो जाने का आभास होता है।प्रकृति का नियम कितना कड़ा है एक मिनट का विलम्ब सूर्य देव को पसन्द नहीं है।हो भी क्यों नहीं ।वह जब स्वयं विलम्ब नहीं करते हैं तो दूसरे से भी तो यही अपेक्षा रखेंगे।
सूर्यदेव का सबसे बड़ा अनुकरण करती हैं नदियां।नदियां सूर्य की लालिमा से सराबोर वह हिलोरें भरने लगती हैं।कल कल करती धारायें अपनी गति से आगे बढ़ने लगती हैं।इतराती मुस्काती वह आगे बढ़ने लगती हैं।समुद्र उसकी मंजिल होती हैं।जैसे वह किसी कवि की कल्पना हो।समुद्र जैसे नदी को बुला रहा हो-
आओ पिय तुम मिल जाओ
बांहो में मेरे तुम भर जाओ
गलबहियां खाती तुम मुस्काओ
पिया पिय का मिलन करवा जाओ'
नदियों की धाराएं समुद्र से मिलने के लिए बढ़ जाती है।समुद्र अपनी दोनों बांहों में भर लेना चाहता है।समुद्र भी हर्षित है प्रफुल्लित है।नदियां मटरा मटरा कर चलती हैं लेकिन समुद्र उतावला हो रहा है नदी को अपनी बाहों में भर लेने के लिए।लेकिन नदियां इतराती बलखाती बढ़ती हैं।उसे कोई जल्दी बाजी नहीं है।
चिड़ियों का दल नदी के किनारे जलपान करने आती हैं।वह जैसे नदी की सारी कारगुजारियों को समझ रहा हो।चिड़ियों का जागना भी समय से हो जाता है।चिड़ियों का भी दो स्थल नित्य का जाना रहता है।एक नदी किनारे तक दूसरा आकाश की ऊंचाई तक।नदी में जल पीने के पश्चात वह आकाश में अठ खेलियां खेलने लगते हैं।प्रात:काल में जैसे आकाश में वह अपना व्यायाम कर रहा हो।आकाश इन जीवों को कहता है-
आओ हे नरजीव चराचर
गाओ हे गीत धराधर
हर्षित हो तुम जीव धरती पर
देखो हुआ अब भोर पूर्व धरापर
यह कवि कल्पना कर सकता है।लेकिन कुछ जीव हैं जिसका आलस्य उसका साथ नहीं छोड़ता है।वह विस्तर छोड़ना ही नहीं चाहता है।
हम प्रकृति के जितने करीब होते हैं उतने ही स्वस्थ होते हैं-
उठ जाग जाग अब भाग भाग
अलस न करे ताग ताग
लग जाये न कहीं दाग दाग
छोड़ो भगाओ रोगराग।
यही जीवन है जब सूर्य हम सबों को जगाने आता है।
Friday, September 27, 2019
Jeevandarshan
Monday, June 3, 2019
जीवन में सीखना जारी रखें।
जीवन में हम सीखना जब छोड़ देते हैं वहीं से हमारा जीवन बढ़ना भी छोड़ देता है।उसी दिन से हम स्थिर हो जाते हैं।सीखने की गति से ही हमारी बुद्धिमत्ता का पता चलता है और जब हम सीखना ही छोड़ देते हैं तो हमारी बुद्धि कुछ दिनों तक तो एक समानता की स्थिति में चलती है लेकिन एक समय के बाद वह स्थिर और रुक सी जाती है।धीरे धीरे उसमें गिरावट आने लगती है और एक समय के बाद उसमें मतिभ्रम और स्मृतिभ्रंश की स्थिति आ जाती है,यह हमारे जीवन को कहीं का नहीं छोड़ता है।
सीखना आपको किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ना चाहिए।भले ही आप बड़े ज्ञानी हों,जीवन के हर पहलू को सीख लिया हो जान लिया हो,विज्ञान से लेकर ज्योतिष तक को जान लिया हो,प्रत्येक विद्या के विशारद् बन गये हों।मान लीजिए आपके जीवन में सीखने के लिए कुछ भी नहीं बचा हो लेकिन कुछ न कुछ उसमें सुधार करने के लिए जरूर बचा रहता है।
विद्या विचार में हमेशा नवीनीकरण की संभावना बची ही रहती है।युग बीत जाते हैं लेकिन नये नये अनुसंधान की जरूरत इसीलिए पड़ती है क्योंकि इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं होता है।आज कोई कार्य किया तो वह नवीन होता है कल वही पुराना हो जाता है।यदि जीवन में नवीनता को अपनाकर रखी नहीं जाये तो जीवन से रोचकता समाप्त हो जायेगी।
सीखना आप सोच रहे होंगे कि किससे जारी रखें तो एक बच्चे के कार्यकलाप को देखें आप उससे भी नवीन ज्ञान पा सकते हैं।वह नया होता है।उसका सारा कर्म नया होता है।विचार नये,भाव नये, समझशक्ति नयी ,उसकी चपलता इतनी ज्यादा होती है कि वह किसी जवान को दौड़ में थका दे,तो वह बच्चा भी आपको नया विचार दे सकता है।मैं समझता हूं कि एक बच्चा जितना बड़ा शिक्षक हो सकता है उतना बड़ा शिक्षक एक वैज्ञानिक भी नहीं हो सकता है।
सीखना कभी नहीं छोड़ें,सीखने की कोई उम्र नहीं होती है।आप यह मानकर चलिए कि जीवन का आप अन्त उसी दिन कर लेते हैं जिस दिन से आप सीखना छोड़ देते हैं।
सीखना एक कला है, एक व्यक्ति को मैं देखता था वह जो काम मैं जानता था वह हमसे देखकर सीख लेता था बाद में वह उसी कार्य को अपने द्वारा हुआ बताता था सारा यश वह लूट ले जाता था और मैं अपने काम को अपना नहीं बता पाता था।मैं नहीं कहता कि आप उसी के जैसा बने।लेकिन सीखना न छोड़ें।
जरूरत पड़े तो आप कुत्ते से भी सीखें।जरूरत पड़े तो चींटी से भी सीखें।अब आप सोच रहे होंगे कि यह आदमी कहां चींटी और कुत्तों में ले जा रहा है।कुत्ते को आप देखेंगे कि बैठने से पहले अपनी पूंछ से जमीन को साफ करता है।सफाई की शिक्षा हम उससे क्यों नहीं ले सकते हैं?चींटी को आप देखते होंगे कि वह कभी बैठती नहीं है।आराम करते उसे कोई नहीं देखता है।तो क्या हमें उससे आलस्य त्यागने की शिक्षा नहीं लेनी चाहिए?
इसलिए पहले आप सीखने के लिए तैयार तो होवें बांकी सीखाने के लिए यहां सभी बैठे हुए हैं।

