Tuesday, April 30, 2019

जीवन से बाहर कुछ भी नहीं

  सारी जिंदगी जी लेने के बाद भी कुछ लोग जीवन जीना नहीं सीख पाते हैं,वे ये और वो के चक्कर में ही पड़े रह जाते हैं।सबसे पहले तो वह अपने जीवन के उद्येश्य को नहीं समझ पाते हैं।इसी को समझाने के लिए अनेक गुरुओं ने अपनी बडी़ जायदाद बना ली।
       जिंदगी को तो अपनी गति से ही आगे बढ़ना है।भले ही तुम रूक जाओ आगे नहीं बढ़ो,लेकिन क्या जिंदगी तुम्हारे रूकने और सम्हलने का इंतजार करती है।उसकी गति एकसमान चलती है।बाढ़,सूखा,अत्याचार,अनाचार सब चलता रहता है लेकिन जीवन अपनी गति से चलता ही जाता है।हम तुम सब चलते जाते हैं।
      मान लो कोई वीमार है।वह निराश है।निराशा विमारी का सबसे बड़ा कारण होता है।तुम चलना छोड़ देते हो कि स्वस्थ होंगे तब चलेंगे।काम पर जायेंगे।दवा ले रहे हैं।तुम्हारे शरीर का ईलाज तो डॉक्टर कर देगा लेकिन मन के भीतर जो भय भूख निराशा बैठी हुई है उसका ईलाज कौन डॉक्टर करेगा?उसके तो डॉक्टर तुम्हीं हो?जब तुम अपना ईलाज स्वयं नहीं कर पाओगे तो तुम्हारा ईलाज बाहर का कौन डॉक्टर कर सकेगा।
       स्वस्थ होने के लिए भी मन से विचार बनाना पड़ता है कि हां मुझे अब ठीक हो जाना है।अभी सारे कार्य बांकी हैं,उसे करना है।जहां हमें अपने कार्य की याद आती है वहीं हम ठीक होने लगते हैं।
      जीवन में सबसे बड़ी निराशा का कारण होता है दूसरों को बढ़ते देखकर जलन होना,दूसरों की शान्ति देखकर स्वयं को निराश कर लेना।दूसरा क्या कर रहा है तुम क्या कर रहे हो ,दोनों अलग अलग बात है।दूसरे के जीवन से तुम्हारा जीवन नहीं चल सकता है।कोई तुम्हारी मदद कर दे उससे तुम्हारा जीवन नहीं चल सकता है।तुम्हें अपनी मदद स्वयं करनी होगी।
    इसलिए दूसरों के जीवन से कभी अपना आकलन मत करो।ईश्वर सब को अलग अलग बनाया है।तुम अलग हो तुम्हारा संसार में कर्म भी अलग होगा।सहयोग और सद्भाव जीवन से दूर मत करो।एक बात का अवश्य ध्यान रखो कि जो भी कर्म करो उससे दूसरों को कष्ट नहीं पहंचे।कुछलोग अपने बड़े होने की नाजायज लाभ उठाते हैं।इसी को स्वार्थ कहते हैं।जबकि कोई बड़ा अपनी तिकड़म से नहीं बनता है वह बड़ा बनता है मानवीय बोध से।
        मानवीय बोध ही हमें वह समझ देता है जिससे हम स्वयं को और दूसरों को समझते हैं।इसे बनाये रखो।

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