Tuesday, December 10, 2019

जीवन सबको अवसर देता है।

जीवन में अनेक लोग अवसर की तलाश में ही लगे रह जाते हैं।यदि हमें अपने जीवन को सही अर्थ देना है और सही कर्म करना है तो हमें अपने हूनर को पहचानना पड़ेगा।हमें अपनी शिक्षा दीक्षा को जानना होगा कि हम कौन सा कर्म अच्छी तरह से कर सकते हैं।
    दुनिया में सबसे बड़ी समस्या आती है लोगों को अपने कर्म की पहचान नहीं हो पाती है।वह अपनी ऊर्जा को नहीं पहचान पाता है।इससे ही सारी समस्या रहती है।
मनुष्य जब नहीं समझ पाता है कि उसे कौन सा कर्म करना चाहिए तो वह जैसे तैसे कुछ भी करने लगता है।लेकिन इस कार्य में वह अपनी ऊर्जा का सही आकलन नहीं कर पाता है।आनंद के साथ कर्म नहीं कर पाता है तो वह दुःखी रहता है।इस स्थिति में वह अपने लक्ष्य को नहीं पहचान पाता है और उस काम को उसे बीच में ही छोड़ना पड़ता है।
काम के सही नहीं चलने से निराशा जीवन में घेरने लगता है।निराशा के आने से वह अपने सही काम को फिर से नहीं कर पाता है।निराश व्यक्ति जीवन में आगे नहीं बढ़ पाता है।
   एक कहानी मुझे याद आती है।एक शिष्य अपने गुरू के साथ कहीं जा रहा था।गुरू अपने शिष्य के बताये रास्तों का ही अनुसरण कर रहे थे।एक रास्ते पर तिराहे पर जाकर शिष्य ठिठक जाता है।शिष्य से गुरू पूछते हैं कि क्या हुआ ठिठक क्यों गये?शिष्य ने कहा गुरूजी ये तीनों सड़क मुझे भ्रमित कर रही है।तिराहे पर पेड़ भी एक ही समान है।गुरू ने कहा हमेसा यह ध्यान रखो कि किस रास्ते पर तुम्हें जाना है?चलो यहां हमें याद है कि जिस रास्ते पर आक का पौधा बहुत ज्यादा है उसी रास्ते पर जाना है।फिर आगे जो चौराहा है उसका ध्यान है या नहीं वहां का मुझे ध्यान नहीं है।दोनों आगे चलते जा रहे थे।जब चौराहा आया तो शिष्य फिर ठिठक गया।गुरू ने इसबार मार्गदर्शन नहीं किया।वह एक गलत रास्ते पर आगे बढ़ गया।बहुत दूर चलते चलते शिष्य जब थक गया तो पूछा गुरूजी कहीं गलत रास्ते पर तो नहीं आ गये।गुरूजी ने फिर कुछ नहीं कहा।फिर आगे चलते गये और पहुंच गये गंगा किनारे।शिष्य ने कहा गुरूजी हमलोग गलत रास्ते पर आ गये हैं।गुरू ने कहा अब यहीं स्नान ध्यान तपस्या की जायेगी।
     गुरूजी को तो अभ्यास था उपवास का वह तपस्या में लीन हो गये।शिष्य को जब भूख लगी तो गुरूजी से वहां से प्रस्थान करने के लिए कहा।गुरूजी ने दण्डस्वरूप उसे और दो दिनों तक वहीं रहने के लिए कहा।
   शिष्य की हालत भूखे प्यासे खराब होने लगी तो गुरूजी ने शिष्य से कहा"जब कहीं जाते हैं तो उस रास्ते को अच्छी तरह पहचानना चाहिए क्योंकि लौटना भी उसी रास्ते से है।दूसरा जहां जाना हो उसकी मंजिल कहां तक ले जायेगी यह पता होना चाहिए अन्यथा भूखे प्यासे रह जाओगे।"फिर गुरूजी शिष्य को लेकर सही रास्ते पर गये फिर भोजन पानी प्राप्त हुआ।
   यह जीवन और कर्म भी इसी समान है।यदि जीवन सही रास्ते पर चलता है तो मंजिल भी मिल ही जाती है।
   भगवान सभी को जीवन में सैकड़ों अवसर देते हैं।उस अवसर को पहचानना पड़ता है।वह अवसर कौन होगा कहां से आयेगा पता नहीं।हो सकता है आप ट्रेन से जा रहे हैं और किसी व्यक्ति से बात करते हैं और वह किसी काम के बारे में बताता है।वह भी अवसर ही होता है।कभी आप बैंक जाते हैं और कोई बैंकर आपको लॉन का ऑफर कर दे आपको पूंजी की आवश्यकता है।आपको वहीं पर सोचना है कि कितना लॉन लें कि आपका सारा काम हो जायेगा।
   अवसर पहचानने में भूल नहीं करनी चाहिए।

Monday, December 9, 2019

जीवन जीने की ललक

दुनिया में कौन ऐसा है जो अपना जीवन नहींं जीना चाहेगा? यदि आप किसी की जिजीविषा को समझना चाहते हैं तो एक वृद्ध से मिलें जो मृत्यु की शय्या पर लेटा है उसे पता है कि वह ज्यादा दिन तक दुनिया में जीवित नहीं रहनेवाला है।लेकिन वह मरना नहीं चाहता है।वह और थोड़ा और थोड़ा जी लेना चाहता है।
   एक कहानी मुझे याद आती है।एक साधू थे वह भगवान से वरदान पाये थे कि तुम्हें अंतिम के दस वर्ष दिये जाते हैं जिसमें तुम जितना चाहो ऐश मौज से अपना जीवन जी सकते हो।लेकिन मृत्यु से छह माह पूर्व मैं आऊंगा तुम्हें सचेत कर जाऊंगा तुम अपना सभी काम निपटा लेना। मृत्यु से एक दिन पूर्व आऊंगा और तुम्हें एक चेतावनी दे जाऊंगा और तुम्हें खुशी खुशी उस आसन पर बैठना है जिसपर बैठकर तुम्हें स्वर्ग की ओर प्रस्थान करना है।लेकिन यदि तुम उस आसन पर बैठा नहीं मिलेगा और खुशी खुशी जाने को तैयार नहीं मिलेगा तो मैं लौट जाउंगा।उस साधू ने सभी बातों में हां में हां मिला दी।
   वह साधू बड़े ही सुखपूर्वक अपना जीवन जीने लगा।परिवार बन गया ।बेटे बेटियां सब आ गई।दस वर्ष कैसे बीता पता ही नहीं चला।तय समय पर भगवान आये चेतावनी देकर चले गये।छह माह का समय बीत गया।मृत्यु से एक दिन पूर्व भगवान फिर आये ।साधू से कहा हम इस समय आयेंगे तुम उस आसन पर बैठा मिलना।अब साधू सोच में पड़ गया।अभी तो बच्चों की पढ़ाई नहीं हुई है।बेटी की शादी हो जाती तो अच्छा होता।अभी तो हमने जीवन का आनंद भी नहीं लिया है।
   तय समय में भगवान आये लेकिन आसन खाली देखा।फिर सूक्ष्म रूप में भगवन ने साधू को एक विस्तर पर लेटा देखा वह भी चिन्तित ।भगवान वायदे के अनुसार लौट गये ।फिर एक वर्ष तक लौटकर नहीं आये।साधू एक वर्ष तक मृत्यु के भय से विस्तर पर ही लेटा रहा।फिर एक वर्ष बीत गया।फिर वही हालत।इसप्रकार दस वर्ष और बीत गये।
  दसवें साल तक साधू की हालत दयनीय हो गई थी।भगवान ने कहा कि क्यों और कितने शरीर को त्रस्त करोगे?तुम जब मोह माया सबका त्याग कर चुके थे तभी ही तुम अच्छे थे।हमने शायद इस माया के जंजाल में फंसाकर तुममें संसार के प्रति मोह जागृत कर दिया है।यदि तुम आज हमारे साथ नहीं चलते हो तो मैं फिर यहां नहीं आऊंगा और  तुम्हें ले जाने के लिए यम ही आएंगे। आज तुम्हारा अंतिम दिन है।
   साधू ने सोचा कि भगवान सही कह रहे हैं मैं डरकर जी रहा हूं।मृत्यु मेरे करीब है लेकिन मैं जा नहीं रहा हूं।यह जीना तो कोई जीना नहीं है।शरीर में थोड़ी सी भी ताकत नहीं बची है।अब चलने में ही लाभ है।अंतिम समय में रोते बिलखते वह जाने लगे।घर के सभी लोग उनकी वीमारी से परेशान होकर मृत्यु की ही कामना करने लगे थे।
   यही है जीवन का आलाप। जिसका मोह किसी का साथ नहीं छोड़ता है।वह बड़ा से बड़ा ज्ञानी ही क्यों न हो।लेकिन मोह से बंधकर हम जीवन में जितना भी कुछ भी कर लें।लेकिन जब जीवन से जाने का समय आता है तो सबको जाना ही होता है।

Thursday, November 7, 2019

ऊषा कीलप्रथम किरण

ऊषा की पहली किरण जब हमारे ऊपर पड़ती है हमारा कण कण खिल खिला उठता है।भोर हो जाने का आभास होता है।प्रकृति का नियम कितना कड़ा है एक मिनट का विलम्ब सूर्य देव को पसन्द नहीं है।हो भी क्यों नहीं ।वह जब स्वयं विलम्ब नहीं करते हैं तो दूसरे से भी तो यही अपेक्षा रखेंगे।
   सूर्यदेव का सबसे बड़ा अनुकरण करती हैं नदियां।नदियां सूर्य की लालिमा से सराबोर वह हिलोरें भरने लगती हैं।कल कल करती धारायें अपनी गति से आगे बढ़ने लगती हैं।इतराती मुस्काती वह आगे बढ़ने लगती हैं।समुद्र उसकी मंजिल होती हैं।जैसे वह किसी कवि की कल्पना हो।समुद्र जैसे नदी को बुला रहा हो-
         आओ पिय तुम मिल जाओ
             बांहो में मेरे तुम भर जाओ
               गलबहियां खाती तुम मुस्काओ
                  पिया पिय का मिलन करवा जाओ'
नदियों की धाराएं समुद्र से मिलने के लिए बढ़ जाती है।समुद्र अपनी दोनों बांहों में भर लेना चाहता है।समुद्र भी हर्षित है प्रफुल्लित है।नदियां मटरा मटरा कर चलती हैं लेकिन समुद्र उतावला हो रहा है नदी को अपनी बाहों में भर लेने के लिए।लेकिन नदियां इतराती बलखाती बढ़ती हैं।उसे कोई जल्दी बाजी नहीं है।
  चिड़ियों का दल नदी के किनारे जलपान करने आती हैं।वह जैसे नदी की सारी कारगुजारियों को समझ रहा हो।चिड़ियों का जागना भी समय से हो जाता है।चिड़ियों का भी दो स्थल नित्य का जाना रहता है।एक नदी किनारे तक दूसरा आकाश की ऊंचाई तक।नदी में जल पीने के पश्चात वह आकाश में अठ खेलियां खेलने लगते हैं।प्रात:काल में जैसे आकाश में वह अपना व्यायाम कर रहा हो।आकाश इन जीवों को कहता है-
      आओ हे नरजीव चराचर
         गाओ हे गीत धराधर
           हर्षित हो तुम जीव धरती पर
             देखो हुआ अब भोर पूर्व धरापर
यह कवि कल्पना कर सकता है।लेकिन कुछ जीव हैं जिसका आलस्य उसका साथ नहीं छोड़ता है।वह विस्तर छोड़ना ही नहीं चाहता है।
   हम प्रकृति के जितने करीब होते हैं उतने ही स्वस्थ होते हैं-
उठ जाग जाग अब भाग भाग
     अलस न करे ताग ताग
       लग जाये न कहीं दाग दाग
       छोड़ो भगाओ रोगराग।
       यही जीवन है जब सूर्य हम सबों को जगाने आता है।
      

Friday, September 27, 2019

Jeevandarshan

Download this App, https://play.google.com/store/apps/details?id=com.analyticspayment.monitor

Monday, June 3, 2019

जीवन में सीखना जारी रखें।

जीवन में हम सीखना जब छोड़ देते हैं वहीं से हमारा जीवन बढ़ना भी छोड़ देता है।उसी दिन से हम स्थिर हो जाते हैं।सीखने की गति से ही हमारी बुद्धिमत्ता का पता चलता है और जब हम सीखना ही छोड़ देते हैं तो हमारी बुद्धि कुछ दिनों तक तो एक समानता की स्थिति में चलती है लेकिन एक समय के बाद वह स्थिर और रुक सी जाती है।धीरे धीरे उसमें गिरावट आने लगती है और एक समय के बाद उसमें मतिभ्रम और स्मृतिभ्रंश की स्थिति आ जाती है,यह हमारे जीवन को कहीं का नहीं छोड़ता है।
         सीखना आपको किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ना चाहिए।भले ही आप बड़े ज्ञानी हों,जीवन के हर पहलू को सीख लिया हो जान लिया हो,विज्ञान से लेकर ज्योतिष तक को जान लिया हो,प्रत्येक विद्या के विशारद् बन गये हों।मान लीजिए आपके जीवन में सीखने के लिए कुछ भी नहीं बचा हो लेकिन कुछ न कुछ उसमें सुधार करने के लिए जरूर बचा रहता है।
       विद्या विचार में हमेशा नवीनीकरण की संभावना बची ही रहती है।युग बीत जाते हैं लेकिन नये नये अनुसंधान की जरूरत इसीलिए पड़ती है क्योंकि इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं होता है।आज कोई कार्य किया तो वह नवीन होता है कल वही पुराना हो जाता है।यदि जीवन में नवीनता को अपनाकर रखी नहीं जाये तो जीवन से रोचकता समाप्त हो जायेगी।
       सीखना आप सोच रहे होंगे कि किससे जारी रखें तो एक बच्चे के कार्यकलाप को देखें आप उससे भी नवीन ज्ञान पा सकते हैं।वह नया होता है।उसका सारा कर्म नया होता है।विचार नये,भाव नये, समझशक्ति नयी ,उसकी चपलता इतनी ज्यादा होती है कि वह किसी जवान को दौड़ में थका दे,तो वह बच्चा भी आपको नया विचार दे सकता है।मैं समझता हूं कि एक बच्चा जितना बड़ा शिक्षक हो सकता है उतना बड़ा शिक्षक एक वैज्ञानिक भी नहीं हो सकता है।
       सीखना कभी नहीं छोड़ें,सीखने की कोई उम्र नहीं होती है।आप यह मानकर चलिए कि जीवन का आप अन्त उसी दिन कर लेते हैं जिस दिन से आप सीखना छोड़ देते हैं।
      सीखना एक कला है, एक व्यक्ति को मैं देखता था वह जो काम मैं जानता था वह हमसे देखकर सीख लेता था बाद में वह उसी कार्य को अपने द्वारा हुआ बताता था सारा यश वह लूट ले जाता था और मैं अपने काम को अपना नहीं बता पाता था।मैं नहीं कहता कि आप उसी के जैसा बने।लेकिन सीखना न छोड़ें।
       जरूरत पड़े तो आप कुत्ते से भी सीखें।जरूरत पड़े तो चींटी से भी सीखें।अब आप सोच रहे होंगे कि यह आदमी कहां चींटी और कुत्तों में ले जा रहा है।कुत्ते को आप देखेंगे कि बैठने से पहले अपनी पूंछ से जमीन को साफ करता है।सफाई की शिक्षा हम उससे क्यों नहीं ले सकते हैं?चींटी को आप देखते होंगे कि वह कभी बैठती नहीं है।आराम करते उसे कोई नहीं देखता है।तो क्या हमें उससे आलस्य त्यागने की शिक्षा नहीं लेनी चाहिए?
        इसलिए पहले आप सीखने के लिए तैयार तो होवें बांकी सीखाने के लिए यहां सभी बैठे हुए हैं।

जीवन में प्रकृतिरानी ही ईश्वर की भूमिका निभाती हैं।

https://youtu.be/BSndEalxOEQ

Tuesday, April 30, 2019

जीवन से बाहर कुछ भी नहीं

  सारी जिंदगी जी लेने के बाद भी कुछ लोग जीवन जीना नहीं सीख पाते हैं,वे ये और वो के चक्कर में ही पड़े रह जाते हैं।सबसे पहले तो वह अपने जीवन के उद्येश्य को नहीं समझ पाते हैं।इसी को समझाने के लिए अनेक गुरुओं ने अपनी बडी़ जायदाद बना ली।
       जिंदगी को तो अपनी गति से ही आगे बढ़ना है।भले ही तुम रूक जाओ आगे नहीं बढ़ो,लेकिन क्या जिंदगी तुम्हारे रूकने और सम्हलने का इंतजार करती है।उसकी गति एकसमान चलती है।बाढ़,सूखा,अत्याचार,अनाचार सब चलता रहता है लेकिन जीवन अपनी गति से चलता ही जाता है।हम तुम सब चलते जाते हैं।
      मान लो कोई वीमार है।वह निराश है।निराशा विमारी का सबसे बड़ा कारण होता है।तुम चलना छोड़ देते हो कि स्वस्थ होंगे तब चलेंगे।काम पर जायेंगे।दवा ले रहे हैं।तुम्हारे शरीर का ईलाज तो डॉक्टर कर देगा लेकिन मन के भीतर जो भय भूख निराशा बैठी हुई है उसका ईलाज कौन डॉक्टर करेगा?उसके तो डॉक्टर तुम्हीं हो?जब तुम अपना ईलाज स्वयं नहीं कर पाओगे तो तुम्हारा ईलाज बाहर का कौन डॉक्टर कर सकेगा।
       स्वस्थ होने के लिए भी मन से विचार बनाना पड़ता है कि हां मुझे अब ठीक हो जाना है।अभी सारे कार्य बांकी हैं,उसे करना है।जहां हमें अपने कार्य की याद आती है वहीं हम ठीक होने लगते हैं।
      जीवन में सबसे बड़ी निराशा का कारण होता है दूसरों को बढ़ते देखकर जलन होना,दूसरों की शान्ति देखकर स्वयं को निराश कर लेना।दूसरा क्या कर रहा है तुम क्या कर रहे हो ,दोनों अलग अलग बात है।दूसरे के जीवन से तुम्हारा जीवन नहीं चल सकता है।कोई तुम्हारी मदद कर दे उससे तुम्हारा जीवन नहीं चल सकता है।तुम्हें अपनी मदद स्वयं करनी होगी।
    इसलिए दूसरों के जीवन से कभी अपना आकलन मत करो।ईश्वर सब को अलग अलग बनाया है।तुम अलग हो तुम्हारा संसार में कर्म भी अलग होगा।सहयोग और सद्भाव जीवन से दूर मत करो।एक बात का अवश्य ध्यान रखो कि जो भी कर्म करो उससे दूसरों को कष्ट नहीं पहंचे।कुछलोग अपने बड़े होने की नाजायज लाभ उठाते हैं।इसी को स्वार्थ कहते हैं।जबकि कोई बड़ा अपनी तिकड़म से नहीं बनता है वह बड़ा बनता है मानवीय बोध से।
        मानवीय बोध ही हमें वह समझ देता है जिससे हम स्वयं को और दूसरों को समझते हैं।इसे बनाये रखो।

Saturday, April 13, 2019

ना कहना सीखें,लेकिन तरीके से।

जीवन दर्शन,जीवन में अनुभव ही सिखाता है जो आपके पास नहीं जब होता है तो जीवन बेतरतीब चलती रहती है।जीवन में अनेक लोगों को यह पता नहीं होता है कि वह कौन सा शब्द कहां बोलें।
           ऐसे में एक बहुत ही छोटा सा शब्द आता है न"यह देखने में बड़ा छोटा है लेकिन इस शब्द के महत्व को जो नहीं जान सका उसकी अपनी सफलता की सीढ़ियां चढ़नी बन्द हो जाती है।
           देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर।वही न का महत्व है।यह कहां पर किसे बोलना है यह जान लेना चाहिए।सबसे पहले कहा जाता है कि नौकरी में ना ना करी ।'लेकिन नौकरी में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जिसमें महिलाओं को अपने इज्जत पर बन आती है।यहां यदि आपने देर की तो आपकी इज्जत उतरने का सिलसिला शुरू हो जाएगा,और बाद में कभी आप रोक नहीं पाएंगे,यहां आपकी सहायता करने बस एक शब्द आएगा 'न' जिसका आपने प्रयोग कर लिया तो जीवन भर की मुसीवत से बच जाएंगे।
            पिता को कभी किसी काम के लिए मना नहीं करें,लेकिन यदि पिता नशाखोर हो अनुचित कार्य के लिए पढ़ाई छूड़ाकर घर में बैठाना चाहता हो तो,यहां पिता को न बोलें क्योंकि जो पढ़ाई का उम्र मिला हो वह बीत जाएगा।
       पत्नी को पति के किसी काम में ना नहीं कहनी चाहिए।लेकिन पति यदि जुआरी हो शराबी हो,बच्चों का हक खानेवाला हो तो परिवार को कैसे बचाया जाएगा,यहां पति के अनुचित मांग को न कहकर रोकें,लेकिन ध्यान रखें कि घर में तनाव और हिंसा का वातावरण नहीं बने।पति से पूरी तरह जिद पर उतरने पर कलह किच किच बढ़ सकता है,इसलिए यहां प्रेमपूर्ण न की आवश्यकता है।
        बॉयफ्रेंड यदि कोई हो और वह शारीरिक संबंध बनाने के लिए जिद करता है तो उसे प्रेमपूर्ण न बोलें यहां आपका यह न एक अमृत का काम करेगा,क्योंकि जीवन में छोटी उम्र से हीबॉयफ्रेंड बनने लगते हैं,यह कोई जरूरी नहीं है कि आपकी शादी उसी से होगी।यहां एक ना सौ जिन्दगी बचा ले जायेगा।

        दूसरा ,जब विवाह हो जाये और पति पूछे कि तुम्हारे कितने पुरूष दोस्तों से शारीरिक संबंध रहे,इसमें जवाब न में ही होना चाहिए ,क्योंकि यहां थोड़ी सी भी चूक हुई तो आपको संबंध विच्छेद तक झेलना पड़ सकता है।
       तो दोस्तों यह जीवन के न के कुछ टिप्स हैं,जिसे अपनाने से आपका जीवन सुखी और सुखद रहेगा।

Tuesday, April 2, 2019

क्या कारण है कि लोग योग्यता के बावजूद जीवन सही से नहीं जी पाते हैं।


क्या कारण है कि लोगों के बडे योग्य होने के बावजूद भी वे सही जीवन नहीं जी पाते हैं?

     आपने अनेक लोगों को देखा होगा कि उन्होंने बडी़ मोटी मोटी डिग्री हासील कर ली है,बड़े बड़े ओहदे पर बने हुए हैं,लेकिन रहन सहन इतना बेतरतीब रखते हैं कि किसी को भी उनके आचरण पर गुस्सा आना स्वाभाविक है। ज्यादातर इस आचरण का प्रभाव परिवार पर पड़ता है।जिनमें सबसे पहले प्रभावित होती हैं पत्नी फिर मां बाप और उनके अपने बच्चे।अब पत्नी और बच्चों के लिए समस्या हो जाती है कि उन्हीं के बच्चों के सामने कैसे अपने पति को डांटे।बच्चों के लिए समस्या होती है कि ऐसे पापा के कारण रोज स्कूल जाने में लेट हो जाते हैं जिसकारण स्कूल में डांट और पिटाई रोज खानी पड़ती है।
             समस्या तब और बड़ा विकराल रूप धारण कर लेती है जब बच्चों को इसकी शिकायत अपनी  मम्मी से करनी पड़ती है और मम्मी को अपने पति के मम्मी पापा से,मम्मी पापा को हारथककर यह कहना पड़ता है कि हमलोग तो बचपन से ही उसे समझा समझाकर थक गये हैं।वह अपनी आदत को आजतक नहीं सुधार पाया,अब वह बाल बच्चोंवाला है क्या उसे इस स्थिति में कहना उचित होगा और बात जहां कि तहां धरी कि धरी रह जाती है।बच्चों की समस्या का निदान नहीं निकल पाता है।
      ऐसे पिता और घर के मुखिया के लिए कुछ टिप्स दिये जा रहे हैं।वास्तव में टिप्स केवल ऐसे पिता के लिए ही नहीं हैं बल्कि सभी लोगों को अपनी जांच करनी चाहिए।पहले देखना चाहिए कि क्या आप किसी प्रकार का नशा तो नहीं करते हैं,यदि हां तो आपकी आदत में उससे क्या क्या बदलाव आ रहा है।यदि सीमा के भीतर नशा की लत है और उससे आपके कोई कार्य प्रभावित नहीं हो रहे हैं तो आप एक सामान्य और केयरिंग फादर हैं,यदि आप नशा करते हैं और आपका सभी कार्य गड़बड़ चल रहा है तो आप समझ लें कि आपसे बहुत लोगों को बहुत समस्या हो रही होगी।आप तुरत अपनी आदत को सुधारने की योजना बनायें, जिन लोगों को आपसे तकलीफ हुई है उनसे अपने करतूत पर माफी मांग लें।नशा करना छोड़ दें।
        यदि आप देर से उठने के आदी हैं ,तो अपना निरीक्षण करें।इस स्वभाव को बदल लें।समय पर उठना शुरू कर दें।बच्चों को समय पर स्कूल ले जाने लगें।
       क्या आपके जूते कपड़े बेतरतीब फेके रहते हैं,तो आप समझ लें आप अपने परिवार के दुःख का कारण हैं,फौरन आदत में सुधार करें।जूते सही जगह पर रखें,कपड़े
फेंके नहीं।
       क्या आपको सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट,बिडी़ या सिगार पीते हैं तो आप यह जान लें कि अनेक लोगों के दुःखों कारण बन रहें हैं।इस आदत को फौरन बदल डालें।सार्वजनिक स्थानों पर बिडी़ सिगरेट पीना छोड़ दें।
       क्या आप अपने पत्नी बच्चों पर समय खर्च नहीं करते हैं तो आप यह जान लें कि आगे आनेवाले समय में आपका परिवार फिसड्डी जीवन जियेगा ,इसलिए उसपर अपना भरपूर समय दें।
         यदि आप ऐसा करते हैं तो दुनिया में आपको एक अच्छे इन्सान के रूप में जाना जायेगा।